ए वतन तु है अब इश्क मेरा

तुझपे लुटाऊं जान रे
गोली खाऊं सीना तान रे,
ये जिंदगानी की हमने तेरे नाम रे
तु कोई और नहीं,
ए वतन तु इश्क़ है मेरा।।

तुझे जो छु के हवा आई है
तेरी सौंधी-सौंधी खुशबू
साथ लाई है,
तेरे इश्क़-ए- रंग ने
रंग दी इश्क़ के रंग में,
अब कहीं मेरा ठौर नहीं
ए वतन तु है अब इश्क़ मेरा।।

आ गया हूं तेरी ही जमीं से दूर मैं,
पर तेरी याद के नशे में चूर हूं मैं,
तेरे सिवा कोई भी सिरमौर नहीं
ए वतन तु है अब इश्क़ मेरा।।

श्वेता चौधरी

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भारत मां का अवतार हूँ मैं

किसी की बेटी
बहन मां हूँ मैं,
भाई का दुलार
बाबूल की जान हूं मैं,
घर की जरूरत
लक्ष्मी की स्वरूप हूँ मैं।।

किसी की पत्नी
प्रेयसी साथी हूँ मैं,
घर की अस्मत
सम्मान हूँ मैं,
सृष्टा के सृजन की
ब्राह्मांड का अर्धभाग हूँ मैं।।

भावनाओं की धार
ममता का भंडार हूं मैं,
धरा की श्रृंगार
बसंत की बहार हूँ मैं,
प्रेमी कवि के पंक्ति की,
रस श्रँगार हूँ मैं।।

शक्ति की श्रोत
सहनशक्ति का अंबार हूँ मैं,
हां वहशियों और दुष्टों के
संहार का आधार हूँ मैं
मैं अबला नहीं,
काली का अवतार हूँ मैं।।

देश की रक्षा में बहनेवाली
रक्त की धार हूँ मैं,
दुश्मनों का सर
धर से अलग कर दे,
हां वही तलवार हूँ मैं।।

गांधी, सुभाष और भगत
की जननी हूँ मैं,
भारत की बेटी ही नहीं
वीर सपूतों की जननी हूँ,
साक्षात भारत मां की अवतार हूँ मैं।।

श्वेता चौधरी

आजादी कब

भारत को आजाद हुए,
मुद्दतों बीत गए,
फिर भी
दुषप्रवृतियों के गुलामी से,
आजादी कब???

घुसखोरी हैं भेंट अंग्रेजों की,
फिर भी उसे सम्भाल बैठे हैं,
अब हमारे देश को
चारों तरफ व्याप्त भ्रष्टाचारियों से,
आजादी कब???

देश की अस्मिता को
तार-तार करनेवाले,
कब के गए,
पर अपने ही घर में,
भारत बेटियों को
उन वहशियों से
आजादी कब?????

कभी धर्म के नाम पर,
कभी भाषा और
क्षेत्र के नाम पर,
होनेवाले दंगाई शाजिसों से
आजादी कब????

बदहाली से परेशान हम,
हमारी संकीर्ण सोच से,
युवाओं के इस देश को
बढ़ती बेरोजगारी के कारण,
भ्रमित लक्ष्य से
आजादी कब????

देश को अपनी खून-पसीने से
सीचनेंवाले किसानों को,
फांसी के फंदे से….
आजादी कब?????

देश की बदहाली में
विचलित निर्दोष आम जनता को
भागीदार मुफ्तखोरों से,
आजादी कब?????

अंग्रेजों से आजाद हुए
एक जमाने हुए,
अंग्रेजी मानसिकताओं से
आजादी कब???

श्वेता चौधरी

सुला लो ना माँ!

खौफनाक अंधेरे में,
गुमनाम सफर में,
खो गई हूं,
मुझे नहीं पता,
मेरा पता क्या है,
मुझे ढ़ूढ़ लो ना माँ !

कड़ी धुप में,
सुनसान राहों में,
भटक गई हूं,
सन्नाटा बड़ा है,
मुझे आवाज दो ना माँ!

जिन्दगी की आपा-धापी में,
जिम्मेदारियों की बोझ ने,
भुल गई हूं,
स्वाद एक निवाले का याद दिला दो
मुझे अपने हाथ से खिला दो ना माँ !

पाया नही तेरे जैसा प्यार इस जहां में,
गिरकर स्वार्थ के किचड़ में,
गंदी हो गई हूं,
अपने वात्सल्य के जल से,
नहला दो ना माँ !

रात कटती है बैचनियों में,
छिन गई है नींद हृदय वेदना में,
मुद्दतों से सो नहीं पाई हूं,
लोरी सुना दो ना,
अपनी गोद में सुला लो ना माँ:!

श्वेता चौधरी

यहीं कहीं

बेईमानी का चारो तरफ है बोलवाला,
ईमानदारी गिन रही होगी आखिरी सांसें
यही कहीं।।
तड़के से नाच रहा मोहब्बत जिस्मोंवाला,
इश्क सुफियाना ले रही होगी अंतिम सांसे,
यही कहीं।।
बढ़ रही हैवानियत और खौफ शैतानोंवाला,
इंसानियत तड़प कर खो रही होगी सांसे
यही कही।।
मन में राज कर रहे है रिश्ते पैसोंवाला,
मर रही होगी रिश्ते की मासूमियतें,
यही कहीं।।

श्वेता चौधरी

खुद से इश्क जरा-सा

कभी खुद से प्यार करके देखो,
कभी खुद से इकरार करके देखो,
खुद पे ही खुद बहक ना जाओ
तो कहना!

जरा सा चुम लो अपने ही अश्क को,
जरा छेड़ दो खुद से ही खुद को,
खुद से खुद को इश्क ना हो जाए,
तो कहना!

थोड़ा-सा वक्त दो खुद को,
जरा सा फिक्र करो खुद की,
खुद मे खुदा मिल ना जाए,
तो कहना!

कैसै इस पीड़ को उड़ेल दूँ

क्षुब्ध हूँ, त्रस्त हूँ,
तुने माँग भरी मेरी,
और छोड़ दिया जलने को,
इस एकाकीपन के आग मे,
तुम ही कहो न!
इन शब्दों मे,
कैसे इस पीड़ को उड़ेल दूँ।।

व्यथित हूँ, पीड़ित हूँ,
सात फेरे लिए तूने,
सात जन्म की खाई कसमें,
और छोड़ दिया तड़पने को,
जग मे ,पतित्यकता कहलाने की आह मे,
अब तुम ही कहो ना!
इन रागों मे,
कैसे इस पीड़ को उड़ेल दूँ।।

प्रज्जवलित हूँ, निःशक्त हूँ,
अपने नाम की श्रृंगार चढ़ाई,
और मुझे इस विवशता मे,
छोड़ गये सिसकने को,
तुम ही कहो अब,
इन भावों मे,
कैसे इस पीड़ को उड़ेल दूँ।।

श्वेता चौधरी