गजल

दुनिया ने चांद पर दाग देखा है,
क्योंकि खुदा ने चांद में,
अहंभाव देखा है।
पत्थर को कठोर कहकर,
यूं ठोकर ना मारिये।
खुदा ने उसमें भी नर्म चिंगारी,
संभाल रखा है।।
फूल भले ही हो खूबसूरत,
नर्म और खुशबू से भरा।
पर चुभने वाली कांटो ने हीं,
उसे पाल रखा है।।
पूरी कायनात के खातिर,
अलग हुए है जमीं और आसमां।
देखिए जरा इसने क्या गजब,
मोहब्बत का मिसाल रखा है।।
खुदा के फैसले मे खुश रहिए,
उसने आपकी भलाई को भी,
कहीं ना कहीं संभाल रखा है।।

…….श्वेता चौधरी

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आधी सोहागन

माई! माई!…….डॉक्टर साहेब ! डॉक्टर साहेब! हमरी बिटिया को होश आ गया है।एक औरत डाक्टर अग्रवाल को सुचना देकर खुशी के मारे उछल रही है। और उसे इस तरहखुश देखकर डॉ.अग्रवाल फफक-फफक कर रो पड़ते है। हेड नर्स की आँखे भी आंसु सेधुंधली पड़ जाती है।डॉ.साहब को ढ़ाढ़स बंधाते हुए कहती है:-जाईए सर उनकी गलतफहमी दूर कर दीजिए।डॉ. अग्रवाल मुझसे:- मुझमें हिम्मत नही है सिस्टर ,आप ही एक बार चेक कर लीजिए।सर! सर! सच में उस लड़की को होश आ गया है, थोड़ा खुद चेक कर लीजिए।मुबारक हो कुन्ती देवी ,आपकी बेटी को सच में होश आ गया।शाम के 5 बज रहे थे ,सुरज ढ़लने को थी रात होने वाली थी। कुन्ती देवी गुड्डनको अभी-अभी गुड्डन को खिचड़ी खिलाकर उसके सर पर हाथ फेर रही थी, ज्यों-ज्योंअंधकार घेर रहा था वो भी अतीत के अंधकार में गुमनाम होती चली गयी।”उसने एक बार फिर, मौसम का जायजा लेने के लिए हल्का सा खिड़की खोला ही था कितेज हवा के झोको के साथ आया बारिश का पानी उसे भिगोंते हुए पूरे कमरे मे फैलगया। झटके से खिड़की बन्द करते हुए सोच में पड़ गई कि:-“आज शायद ही स्कुल जाना हो इतनी बारिश में” और फिर आज से हाफ ईयरली इक्जामशुरु होने वाला है।

अरे! बिटिया आओ…..आओ,जल्दी अन्दर आओ.तुम तो पूरी भींग चुकी हो, छतरी काहेनही ले लेती हो।चाची, लिए थे देखिए ना ऊ भी टुट गयी है। टुटी हुई छतरी दिखाकर कहा बिट्टु ने।(गुड्डन और बिट्टु पिछले दो साल से सहेली थी, आठवीं में दोस्ती हुई थी और दशमीमे पक्की सहेली बन चुकी थी।आज दोनो की छह माही परीक्षा थी।जुलाई का पहलासप्ताह चल रहा था, और ठीक फरवरी माह अगले साल यानि वर्ष 1998 मे होने वालाथा।इसलिए दोनो इस बार छह माही परीक्षा को भी महत्वपूर्ण लेकर ही चल रही थी।चूँकी, दोनो ही मध्यम दर्जे की छात्रा थी दोनो के ही अन्दर वाजीव डर था,इसीकारण दोनो मे से कोई भी तैयारी का साधारण अवसर हाथ से जाने नही देना चाहतीथी।)बिट्टु की आवाज सुनकर, उसने अपने बक्सा से कुर्ती-सलवार निकाली और बिट्टु कीतरफ कपड़़े फेकते हुए कहा-चल अब बाते बन्द कर जल्दी से चेन्ज करके बाहर आ, पहले ही बहुत देर हो चुकी है।इसकी क्या जरूरत थी गुड्डन, बिट्टु कपड़े लपकते हुए बोली।पूरी भींग चूकी है बिटिया पहन ले। गुड्डन की माँ ने कहा।पर चाची…………….पर-वर कुछ नही जल्दी करो, बिट्टु को उसने बनावटी गुस्से से कहा।

जानते हो चंदू अब मन कर रहा है कि अन्नतपुर में एगो बिजनेस कर ले कोई अच्छीजगह मिले तो।काहे नहीं मिलेगा,खोजने से त भगवानो मिल जाता है, डीलर साहब आपको जमीन चाहिएना त निश्चित मिलेगा।इस इलाके मे सब तो आपहि का है बस आप आदेश करिए।चापलूसीकरते हुए चंदू ने बुच्चन बाबू से कहा, तो बुच्चन बाबू का कलेजा गर्व से फुलगया, और उसके होठों पर अहंकार का मुस्कान फैल गया।

गुड्डनमा माई! गुड्डनमा माई! सुनती हो की नही ,कन्हाई जी ने हाँफते हुए अपनीजनानी को आवाज दिए जा रहा था।क्या हुआ बाबूजी………..?????????हांफता आवाज हुआ आवाज सुनकर गुड्डन दौड़ते हुए कन्हाई जी के पास पहूँची।बिटिया गर्म पानी लाव और बाकस पर दवाई ऊहो।ले पुजा ई गरम तेल बाबूजी के पैर और छाती में रगड़ना, हम दवाई लेके आ रहै है।के हुआ रे ! पूजा तुम्हरे बाबूजी को………????????ए गुड्डनमा-बाप ! ए गुड्डनमा -बाप अपन आँखन खोलॉ। और इतना कहकर उसका चेहरापकड़े रोना शुरू कर दिया ।माई ! काहे रो रही हो दवाई दे दिए है आराम करने दो जल्दी ही ठीक हो जाएगें। औरकुन्ती देवी के गोदी से छुटकी को लेकर खिलाने के लिए जाती है।माई! माई! मामा जी आए है। गोबिन्द, दौडकर खुश होकर माँ की गर्दन को पीछे सेपकड़कर लाड जताकर बिस्कुट दिखाया और खाने लगा।कैसी हो दीदी……! पैर छुककर प्रणाम करते हुए रामदीन ने पूछा। खुश रहो! मैं तो ठीक हूं, तुम बताओ…….तुम कैसे हो?बहुरिया और बच्चे तोठीक है ना ?हाँ,दीदी सब ठीक है।चौधरी जी नही दिख रहे………??क्या कहे बऊआ, अब तो जादा ही तबियत खराब रहने लगी है।बिटिया बड़ी हो रहीहै,एगो तो नहीं है चार-चार गो दीहिन दीनानाथ ने।हम त कहते-कहते थक गये है किथोड़ी-सी जमीन खरीदकर देह में लगा लो लेकिन हमरी सुनता कौन है यहाँ।अच्छा तुम ही कहो बबूआ कि बेर-बेगरता लेल ना जमीन-जथा रहता है।हूं…….ई त ठीके कहती हो।एगो पेड़ा के दोकान से छह-छह गो बच्चवा का पालन -पोषण कैसे होता हमरा हृदय हीजानता है।गुड्डनमा दशमी का परीक्षा दे रही है।जमाना बदल रहा है,कम-से-कम दशमी नहीकराऐगें तो बिटिया सब का तो बियाहों कौन करेगा।कहते-कहते कुन्ती देवी का गला रून्ध गया। ना जाने कब से आँखों में समन्दर छुपारखा था सो आज आँखों से बह निकला।दीदी, तुम चिन्ता मत करो दीनानाथ सब पार लगाएगें।

बुधना……रे बुधना!जी मालिक……सुनो, चन्दु को बुला लाओ।जी मालिक अबहिये जाते है।एक सप्ताह से ऊपर हो गया,की मजाल जे एकौ बार भेटों देता। बुधन के चले जाने केबाद बुच्चन बाबू बड़बड़ाने लगे।मालिक! मालिक! थोड़ी देर बाद हांफते हुए आया।के हुआ ???? इतना हांफ काहे रहे हो…..मालिक, चन्दु मालिक का तबियत बहुते खराब है, इसलिए एतना दिन से नही आ रहे है।

‘आईये भाईजी बैठिये’ अपने बिछावन पर से उठते हुए चंदु ने कहा।भाईजी, हम पता लगाए थे यहां के जमीन का। त जानकारी मिला जे ई जमीन कन्हाई काहै।एक बात ऊ ई जमीन बेचवो नही करेगा। ऊको रहने का ईहे जगह मिला है।बुच्चन बाबू -ऊ बात सब छोड़ो पहिले अपना तबियत ठीक करो।चंदु- तबियत त ठीक हो गया है बस थोड़ा कमजोरी है। हम त अपने दु-चार दिन मेंआने वाले थे।बुच्चन बाबू- ठीक है त चलते है एक दिन बात भी कर लेगें और उनके दोकान के पेड़ा का स्वाद भी चख लेगें।कुछ दिन बाद-बेटा,दोकान पर तुमहि हो। तुम्हरे बाबूजी कहाँ है……???? चंदू ने पूछा।बाबूजी तो नही कुछ देर बाद आवेगें।कितना का पेड़ा चाहिए। बहुत ही भोलेपन सेजबाब दिया था गुड्डन ने।अभी-अभी कुछ पहले ही पन्द्रह पुरा करके सोलहवां साल मेप्रवेश किया था उसने। आज रविवार का दिन था,इसलिए बाल धोने के कमर तक लम्बाकाला बाल खुला छोड़ा था उसने।गोल चेहरे पर भोलापन लिए,बड़ी-बड़ी आँखे ऊपर सेमुड़ी हुई बड़ी-बड़ी आँखों की पुतली,सुर्ख लाल गुलाब की पंखुरियो जैसी कामुकहोंठ और उसका दुधिया रंग,छरहरा गठिला बदन कुल मिलाकर बला की खुबसूरत अप्सरा लगरही थी। पच्चीस साल के बेटे होने के बाबजूद बुच्चन बाबू के पूरे शरीर मे सिरहनदौड़ गया था।अपलक उसे निहारते रहे।वैसे भी, बुच्चन बाबू के जिन्दगी में औरत कामतलब ही वासना था।किसी औरत से मिलता तो उसकी नजर नारी देह को निहारता तो फिरअभी-अभी जवानी की दहलीज पर पैर रखने वाली गुड्डन “जो कि सच में किसी गुड़ियाजैसी सुन्दर थी” कैसे उसके नजर से बची रह सकती थी।भाईजी! भाईजी! चंदु जब बुच्चन बाबू के आँखों के सामने हाथ लहराया तो उन्हेकिसी और दुनिया में पाया।भाईजी….भाईजी! उनके शरीर को झकझोड़ा।आं….आ…क..के हुआ???? चंदुकुछ नहीं हुआ भाईजी एक पाव पेड़ा ले लिया है। अब दोकान पर जिसके लिए आए थे ऊतो था नही,अच्छा नही ना लगता है दोकान पर से खाली हाथ लौटना।हाथ मे लिए पेड़ाका पलोथीन दिखाते हुए चंदु बोला।ठीक किए, अब चलो। कन्हाई से दूसरे दिन मिलना होगा। बुच्चन बाबू ने गुड्डन कीतरफ देखते हुए कहा।एगो बात पूछे चंदु…….?जी ! पूछिए। बुच्चन बाबू के खोये-खोये से पूछने पर चंदु चिन्तित स्वर मे हामीभरा।ऊ….दोकान पर बच्चिया कौन थी, कन्हाई की बिटिया क्या????बुच्चन बाबू ने पूछा।हाँ त कन्हाई के दुकान पर उसकी बिटिया नही रहेगी तो और किसे रहना चाहिए। चंदुने अपनी हंसी दबाते हुए जबाब दिया।”वो लड़की सिर्फ हमरी घर की शोभा बनने के काबिल है,पहले वो लड़की मेरे आयेगीअब ,फिर जमीन तो हमरी ही है।”मन ही मन सोचकर बुच्चन बाबू मुस्कुराने लगे।त भाईजी, हम चलते है अब। कुर्सी पर से उठते हुए चंदु ने कहा।कहाँ चले….?हाथ पकड़कर बैठाते हुए बुच्चन बाबू ने कहा।हम सोच रहे थे कि कन्हाई की लड़की से अपने बड़का लड़का सुनील की शादी का बातचलाओ तुम।के…..के कहा भाईजी! अचरज मे पड़ गया ये बात सुनकर चन्दु।वही जो तुमने सुना……..।पर, भाईजी! जमीन से शादी की बात पर कैसे चले गये।क्योंकि हमरे बचवा की शादी की उमर हो गई है और वैसी ही लड़की सुनीलवा के लिएहमका चाहिए।और बात रही जमीन की त आब ओकर बात बाद में सोचेंगे।अपनी वासना भरीनजरों को झुकाते हुए बुच्चन बाबू ने।ई बात एक नम्बर सोचे है आप ।बेचारे कन्हाई का तो बहुत बड़ा भला होजाएगा,चार-चार गो बच्चिया है और भगवान आपका भी भला करेगा।बड़े आदर से चन्दुबोला।पर भाईजी ! ओके पास एतना औकाद कहाँ है? जो आपको तिलक दहेज दे सके।ओके पास एतनाभी औकाद नही की वर-बरयाति का ढ़ंग से खातिरदारी कर सके।दया भाव से चंदु ने कहा।ऊ सब हम कर लेंगे बस तुम कन्हाई को राजी करो।जल्दी ही के बात हुआ हमको कहो।ठीक है ,हम आजहि उससे बात कर लेते है।जाने के लिए कुर्सी से उठते हुए चंदु नेकहा।

गुड्डनमा माई! गुड्डनमा माई!…..कहां गई रे। खुशी से पागल होकर लगातार कन्हाईअपनी जनानी को आवाज दिए जा रहा था।के हुआ….गुड्डनमा बापू काहे चिल्ला रहे हो। आते ही बोल पड़ी के बात है बहुतखुश नजर आ रहे है।गुड्डनमा माई तुम भी सुनोगी ना तो खुशी से पगला जाओगी।अरे! कहेंगे तब ना हम भी खुशी से पगलाएगें। उसी का नकल करते हुए कुन्ती देवीमुस्कुराते हुए बोल पड़ी।अपनी गुड्डन का रिश्ता बहुत बड़े घर से आया है। बगल के हरषा गांव के बुच्चन बाबू के लड़का सुनील बाबू के लिए।अच्छा ! पर कैसे ???अचरज से कन्हाई को ऐसे देख रही थी मानो विश्वास नही हो रहा हो।अरे बतहिया! उस दिन अपनी बिटिया कह रही थी ना कि दु गो लोग हमका खोज रहे थे।ऊकोई और नही चंदु बाबू और बुच्चन बाबू थे। हमरी बिटिया है ही इतनी सुन्दर परीजैसन,पसंद कर लीहिन पहिले नजर में।पर! हमरे पास त वर-बरियाति के खर्चा के लिए भी पैसा नही है,और दान दहेज के लिएकहाँ से पैसा जुटाऐंगे। एतना बड़ा परिवार है,शादि -बियाह बराबरी वालो मे हीठीक होता है, ऊ कहाँ और हम कहाँ। असमंजस में पड़ी कुन्ती देवी ने कहा।हम पगलैल नही ना है, जो तुम कह रही हो ऊ बात हम कर चुके है।और बात रहीबड़न-छोटन का तो शादी-बियाह ने बिटिया का भाग काज करता है, जोड़ी त भगवानलगावत है।ठीके कहते हो……!कुन्ती खुद को समझाते हुए हामी भर दी।

वक्त पंख लगाकर उड़ गया छह महीने कैसे बीता ना ही कुन्ती देवी को और ना हीकन्हैया को एहसास हुआ।शादी का दिन आ भी गया , गुड्डन तो आसमान से उतरी अप्सरालग रही थी सुर्ख लाल शादी के जोड़े में।गुड्डन के मन में शादी को लेकर पिछले एक महीने से सौ सवाल थे। उसकी शादी कीखबर उसे दशमी की परीक्षा के बाद ही दी गई थी क्योंकि कुन्ती देवी नही चाहतीथी कि गुड्डन की पढ़ाई में कोई बाधा आये।परीक्षा के ठीक बाद मां ने खबर केसाथ-साथ उसे बहुत बात समझाया भी था। पर वो मां और प्रश्न का जबाब कैसे पाती।शांत और शर्मिला स्वभाव के कारण “उसको समझने वाली दिल बहुत करीब ” बिट्टु सेभी दिल की बात खुलकर नहीं कर पाती फिर मां से ये सब बात करना उसे अजीब लग रहाथा।उसे बहुत घबराहट हो रहा था जैसे सभी लड़की को होता है।और फिर, सुनील के साथ गुड्डन की शादी भी हो गई। शादी में बुच्चन बाबू नेबढ़-चढ़कर कर दोनो तरफ का खर्चा किये थे। ।विदाई के दिन तो लग रहा था जैसेगुड्डन अब कभी नही मिलेगी। जैसे-तैसे गुड्डन को गाड़ी मे बिठाया गया।फिर गुडड्न ससुराल आ गई, दो झोपड़ीनुमा कमरो से एक भवन में आ गई थी।लोग नई-नवेली दुल्हन को देखने आये,गांव की औरते बड़ाई करती नही थकते।बड़ाई सुनकर बुच्चन बाबू और उनकी पत्नी रेखा का कलेजा गर्व से फुल गया था।एक और आँखे थी जो बेमन से खुश हो रही थी,वो थी रेखा देवी की बड़ी बहन रामदुलारी का।उसका हृदय जल रहा था क्योंकि वह बुच्चन बाबू के नजर के तीर को पढ़ चुकी थी। वहजान रही थी कि बुच्चन बाबू की वासनापूर्ण नजर देख रही थी उस सोलहवर्ष लड़की को।दरअसल,25वर्ष पहले रेखा देवी की शादी बुच्चन बाबू से हुई तब रेखा देवी सेज्यादा आकर्षक रामदुलारी देवी थी।हालांकि, रामदुलारी देवी, रेखा देवी से बड़ीथी लेकिन गोरा रंग और छरहरा बदन के कारण उससे छोटी लगती देखने में। और इस बातका घमण्ड रामदुलारी को बहुत था।रामदुलारी का पति कलकत्ता में रहता था,औरबुच्चन बाबू की नजरे उस पर गड़ी रहती। दोनो में नाजायज संबंध स्थापित हो चुकाथा।ऐसा नहीं था कि रेखा देवी को कुछ भी मालूम नहीं था,उसे जब पहली बार पता चलातो उसने विरोध भी किया पर उसे मार लगता था साथ में छोड़ देने की धमकी भी।बादमें,उसने कुछ भी कहना छोड़ दिया।वो नजायज संबंध आज भी कायम था लेकिन गुड्डन केतरफ उठती हवस भरी नजरें उसे अपने साम्राज्य का अंत लग रहा था।

विदाई के दिन के चौथे दिन चुल्हा – छुआई की रस्म भी हो गया।वह बहुत थक चुकी थीइसलिए बेड पर आते ही नींद के आगोश में चली गई।

बहुरिया ! बहुरिया! कब तक सोयी रहेगी।रामदुलारी के चिल्लाने पर गुड्डन जैसेहड़बड़ा कर उठ कर बैठी।जी! मौसीजी कोई काम है,गुड्डन ने हड़ब़ड़ाते हुए पूछा।बहुरिया! बाबूजी आये है तुम्हारे ,चाय बना दो।रात का सब काम समाप्त कर कमरे में जाती है।आज बहुत थक गई थी,और उसे हल्काबुखार आ गया था।परन्तु दु:ख तब हुआ जब सुनील ने एक बार भी उसके तबियत की फिक्रतक नही की और गुड्डन के कहने पर भी उसके साथ संबंध बनाये।आज उसके आंखो मेंआंसू आ गया था।शादी के दिन से उसने पति का मतलब केवल रात के बिस्तर साझाकरनेवाला मर्द समझा था।दु:ख-सुख में साथ देने वाला मित्र या फिर जिसके साथप्यार और सुरक्षा का ऐसा कोई भी भाव उसने महसुस नहीं किया था।देखो जी! बिटिया को ससुराल गये दो महीना से ऊपर हो गया सोच रही हूं विदागरीकरा लूं।दस दिन रह लेगी फिर दे आना।चेहरे पर चिन्ता,प्यार और खुशी का मिलाजूलाभाव लिए कुन्ती देवी ने कन्हाई से कहा था।मालिक ! मालिक ! बहुरिया के बाबूजी आये हुए है।ठीक है! उन्हें बिठाओ और चाय नाश्ता का इंतजाम मालकिन से कहो करने के लिए, हमआते है। नमस्कार!नमस्कार!कन्हाईबाबू। कुटिल मुस्कुराहट के साथ दिया था।जी! नमस्कार! हाथ जोड़कर अभिवादन का जबाब दिया था कन्हाई ने।आपकी बिटिया बहुत भाग्यशाली है,देखिये कहां से आ गई! बुच्चन बाबू ने एहसान भरेशब्दों में कहा।जी! सब ईश्वर की कृपा और आपका प्रेम है बुच्चन बाबू।आपकी इजाजत हो तो कुछ दिन के लिए बिटिया को ले जाए।कन्हाई ने आग्रह भरे भाव सेबोला!जी! जी! क्यों नहीं????गोबिन्द आते ही दीदी! दीदी! करते घर के अन्दर जा चुका था।उसके बाद कन्हैया जीको भी अन्दर ले जाया गया।गुड्डन, बहुत दिन बाद बाबूजी और गोबिन्द से मिली थीसो बरबस ही उसकी आँखे बरस पड़ी।दीदी आई! दीदी आई! उत्साह से चिल्लाते हुए पूजा दौड़ते हुए आंगन आई।कैसी है बचवा???मां ने लाड से पूछा।ठीक हूं मां! कहते ही फफककर रो पड़ी थी। क्या बताती अपने मन की पीड़ा माँ को।कैसे बताती क्या कहकर यहां भेजा गया है।दो-चार ही दिन पहले उसे कहा गया था किये जमीन सुनील के बिजनेस के लिए मांगना है।उसे तो सुनील ने इतना तक कह दिया थाकि यदि यह जमीन उसे नहीं मिलेगी तो उसे वह हमेसा के लिए छोड़ देगा।ए!गुड्डन! तुम्हारे ससुरालवालों के लिए बाबूजी कपड़ा दिए थे वो सब पसंद आया कीनहीं,जितना औकाद था उन्होंने सब के लिए कपड़ा खरीदा था। अफसोस भरे लहजे मे कहाथा कुन्ती देवी ने।ह…..हां माँ सबको बहुत पसंद आया।कंपकपाते हुए होठों से उसने सफेद झुठ बोलाथा।आजकल उसका मन अलसाया हुआ रहता,हमेशा उसे बेवजह उल्टी जैसा मन रहता।10 दिन आगेचल रहा था इस महिने में सारे लक्षण उसके दुसरे खुशखबरी की तरफ इशारा कर रहा था।चिन्ता की बात नहीं है आपकी बेटी माँ बनने वाली है।पूरे परिवार के लिए खुशी कालहर था।बुच्चन बाबू को जैसे ही पता चला मिठाई लेकर आ पहूंचे।वैसे भी कितने दिनहो चुके थे आँखों की सेकाई नहीं हो पाई थी।”अब तो बहु अपने नैहर वालों से मिल ही चुकी है” हम दिन करके भेज देंगे।हमरीबहु को भेज दीजिएगा।पर, बिटिया का पहला बच्चा तो नैहर में ही होता है ना बुच्चन बाबू! आशा भरीनजरों से देखकर कहा था कन्हाई ने।नहीं…नहीं!ई सब पुरान बात है हमरी बहू का देखभाल यहां अच्छे से नहीं होपाएगा।कन्हाई बाबू गुम हो गए दिन हुआ सुनील गुड्डन को आकर ले गया। गुड्डन पता नहीबहुत रोये जा रही थी,अपनी माई से कोई भी दु:ख नहीं कह पाई।पर वो भी क्या कहतीसब इतने खुश थे और वैसे मामूली बात सब थोड़े था जो कहती।कुन्तीदेवी का हृदयमान ही नहीं रहा था कि उसे अभी जाने दे ,लग रहा था मानों आखिरी ही बार उसे देखरही है।तु समझती क्या है? काहे नहीं बोली अपने बाप को।बाल को पकड़कर खींचते हुए सुनीलबोला।देखिए मेरे बाबूजी के पास वही एक जमीन है। मेरे अलावा भी तीन और बिटिया है अबरोते हुए उसने पैर पकड़ लिया था फिर भी सुनील को दया तक ना आई।सारा दिन गुड्डन काम करती,मौसी सास और सास-ननद का ताना सहती और पति का मार।एक दिन चाय लेकर बुच्चन बाबू के कमरे मे जैसे ही पैर रखा आगे का दृश्य देखकरपैरों तले जमीन खिसक गई! उसने रामदुलारी और बुच्चनबाबू को आपतिजनक अवस्था मेंदेखा। उल्टे पैर वह लौट आई डर से कांप रही थी,किसी को नहीं कह पाई कौन उसकाविश्वास करता।इस बात को दो दिन बीत चुके थे पर गुड्डन के दिमाग वो सारे दृश्य ज्यों केत्यों थे।आखिरकार खुद को रोक नहीं पाई,हिम्मत करके उसने रेखा देवी से सारा बातकहा तो इस बार भी हैरान होने की बारी उसकी थी।देख बहुरिया! औरतों का काम घर की और पति की सिर्फ देखभाल करना है,मर्द के पीछेनहीं जाती।तुम भी घर-परिवार पर ध्यान दो बस !कहती हुई रेखा रसोईघर से निकलपड़ी।8वां महिना पूरा हो चुका था वो जो काम करने लायक करके आराम कर रही थी इतने मेंबुच्चन बाबू की इकलौती बेटी नीतू आई और उसे जगाने लगी।वो गहरी नींद में थी नहीं उठ पाई बस उसने गुड्डन को उतने ऊँचे पलंग से ढ़केलदिया।बस उसका बच्चा जन्म लेकर 2घंटे ही जिन्दा रह सका और गुड्डन चमकी बिमारीका शिकार हो गई।और जब घर आई तो उसकी जिन्दगी बद से बदतर हो चुकी थी।दो दिन ही आये हुए थेअस्पताल से कि बुच्चन बाबू के तेवर बदल चुके थे।सुनील तो वैसे भी कमरे में छहमहीने पहले ही आने बन्द कर दिये थे।आज उसका समान सब भी उसके कमरे से निकाला जारहा था।धोखे से एक सर्ट भी छुट गया वह उसने मौसी से ही मंगवाये थे।ए! बहुरिया तुम्हरा भीखमंगा बाप नहीं देगा ना जमीन तो हम तुम्हरा बुटी- बुटीनोंच लेंगें।अचानक,बुच्चन बाबू को अपने कमरे में पाकर सहम गई थी।तुम तो गीदड़ हो ही नोचने के अलावे कर ही के सकते हो।लेकिन हमरे बाबूजी किसीकीमत पर ऊ जमीन तुमको नहींदेंगे।पर! आज उसे जाने इतना ताकत कहां से आ गया था।अरे! हरामजादी हमको ऐसे जबाब देगी,तुम्हरे बाप को डरा धमका दिए है ऊ भीखमंगाकल ही जाएगा कोर्ट मेरे नाम का कागज बनबाने।उसे पीटकर ये बात कहतेहुए कमरे से बाहर निकल गया।नहीं! ऐसा नहीं हो सकता,मेरे लिए बाबूजी सबका जीवन दांव पर नहीं लगा सकते।मुझेबाबूजी को रोकना होगा।कल सुबह ना जाऐंगे हम आज रात ही भाग जाऐंगे।”जा रहे है, आज सब वसुलेंगे” सोचते हुए जैसे ही गुड्डन के कमरे में गये उसेवहां नहीं पाकर आग बबूला होकर सबको जगा दिया।गुड्डन को पकड़ लिया गया बुच्चनबाबू ने उसे खूब पीटा।और अधमरा करके कमरे मेंबन्द कर दिया।के करे !हमरी बिटिया को बचाना है तो ई करना पड़ेगा। ऐसा कहते हुए लाचारी सेनिकल पड़े थे कागज बनवाने।और कुन्ती देवी सर पीटकर रोने लगी।”आज नहीं हो पाया काम,बस इसे आज भर ही सहन करना है जैसे ही काम हो जाएगा,इसकाभी काम तमाम कर ही देंगे”।गुड्डन ने बुच्चन बाबू की बाते सुन ली थी।चांदनी रात के एक बज रहे थे, गुड्डन खिड़की से कमरे के पिछले भाग मेंकुदी।इसके बाद, जैसे ही आंगन में आयी। देखा कि बुच्चन बाबू और सुनील आंगन मेंही मेन गेट पर सोये हुए थे और मेन गेट पर ताला लगा हुआ था।अब उसे कोई रास्तादिखाई नहीं दे रहा था,और आज नहीं निकलती तो कभी नहीं निकलती।उसे किसी तरहभागना ही पड़ेगा,उसने आव ना देखा ताव मेन गेट के बगल वाले दिवाल पर टुल लगाकरचढ़कर कुद गई।उसके जाने के 15मिनट बाद बुच्चन बाबू पानी पीने के लिए उठे कि टुल दिवाल केपास देखकर सब मांजरा समझ में आ गया।रे सुनीलवा! भाग गई साली जान मरवाएगी।और उसके पीछे भागे।”ज्यादा दूर नही गई उसे कहीं देखल नही है।”पकड़ी जाएगी।इधर गुड्डन भागी जा रही थी,उसे थोड़ा-थोड़ा याद था बिट्टु के साथ तीन सालपहले।आज उसे किसी भी चीज का डर नहीं था।सुबह के 5बज रहे थे दवाई की आखिरी डोज देने के लिए उठी ही थी,सामने का मंजरदेखकर कुन्ती देवी का कलेजा दहल गया।उसकी फूल जैसी बिटिया सिर्फ ब्लाउज औरपेटीकोट में,लम्बे-लम्बे बाल खुले हुए धरती पर बेजान पड़ी है।गुड्…डन! आँखें खोलॉ बेटा!उठ ना बेटा! पत्थर का भी दिल तड़प उठता।रे गो….बिन्दा! पानी ला रे,बेटा….उसका चेहरा पकड़-पकड़ कर उठाने की नाकाम कोशिस कर रही थी।पास ही में बैठेकन्हाई जी रो रहे थे।इतने में बुच्चन बाबू आ पहूँचे और जब तक किसी को कुछ समझ में आता, उसने गुड्डनके बाल पकड़कर घसीटते हुए आंगन तक ले आये।गुड्डन अभी ही तो होश में आयी थी,फिरसे बेहोश हो गयी।कन्हाई जी उठे और गुड्डन को छुड़ाने लगे बुच्चन ने उनके कलेजे पर एक घूंसा जड़दिया।बेचारा कन्हाई कलेजा पकड़कर बैठ गया।और बुच्चन बाबू ने दिन देखार गुडड्नके बाल में आग लगा दी,लाईटर से।कुन्ती देवी बुच्चन बाबू का पैर पकड़ी अपनी बेटी की जान की भीख मांग रहीथी।पुजा पानी डालकर बाल की आग बुझाई।भीड़ जमा हो गई अब तक किसी ने हिम्मत नही की इस अन्याय को रोक सके।चंदू बाबू के समझाने पर बुच्चन बाबू वहां से निकला। दोनो बाप-बेटी को हॉस्पिटलमें एडमिट कराया गया।गुड्डन कोमा में जा चुकी थी,कन्हाई ठीक हुआ और अपनीबिटिया के होश का इंतजार करते-करते, पुजा का शादी की।दो कुवांरी बेटी और दोअबोध बेटा ,पत्नी को बेसहारा करके इस दुनिया इस घटना के पांच साल बाद छोड़करचले गये।और कन्हाई के जाने के बाद इन सात सालों में एक बेटी की शादीकी,गोविन्द और गोपाल को पढ़ाया-लिखाया।गलत संगत में पड़कर गोपाल गलत रास्तापकड़कर लिया कुन्ती देवी ने डॉटा उसने भी जहर खाकर जान दे दी।कितना कुछ झेलाकुन्ती देवी ने इतनें दिनों में।”माई!माई……..!बिटिया……..!कब कुन्ती देवी की आँख लग गई थी अतीत के अंधेरो मेंभटकते-भटकते उन्हे खुद को ही पता नही चला।माई! बाबूजी कहां है????गोबिन्द,पूजा,गोपाल,और छुटकी को बुला दो नामाई………….!अटकती आवाज में कहा गुड्डन ने।हां बिटिया सबको बुला देते है !तुम ठीक हो जाओ फिर घर चलकर बाते….!!मा…ई ह..मको बाबूजी आ..आगो..पाल बुला रहे है।ह…मको जा..ना है……….!!!!!!!

न…नहीं मा…ई ! बोलने दो ना!तुमने कहा था ना माई…..!ह…..ह..मरी शादी के ए…एक दिन बाद कि सिन्दुर,चुड़ी आ..आबिन्…दी आधा सु……हाग होबत है।पूरा सोहाग पति का प्रेमहि हॉ।न…ई बोल ना बेटा……!म…ा…ई! उ..न..से हम बहुते प्रेम किये।पुरी सोहा..गिन बनने के लिए।म..म..गर !मा….ई ! ह…मममममम् रहहह ग….ये अ…आ.धी सोहा..गिन!झुल गई कुन्ती देवी के गोदी में आधी सोहाग

माई! माई!…….डॉक्टर साहेब ! डॉक्टर साहेब! हमरी बिटिया को होश आ गया है।एक औरत डाक्टर अग्रवाल को सुचना देकर खुशी के मारे उछल रही है। और उसे इस तरहखुश देखकर डॉ.अग्रवाल फफक-फफक कर रो पड़ते है। हेड नर्स की आँखे भी आंसु सेधुंधली पड़ जाती है।डॉ.साहब को ढ़ाढ़स बंधाते हुए कहती है:-जाईए सर उनकी गलतफहमी दूर कर दीजिए।डॉ. अग्रवाल मुझसे:- मुझमें हिम्मत नही है सिस्टर ,आप ही एक बार चेक कर लीजिए।सर! सर! सच में उस लड़की को होश आ गया है, थोड़ा खुद चेक कर लीजिए।मुबारक हो कुन्ती देवी ,आपकी बेटी को सच में होश आ गया।शाम के 5 बज रहे थे ,सुरज ढ़लने को थी रात होने वाली थी। कुन्ती देवी गुड्डनको अभी-अभी गुड्डन को खिचड़ी खिलाकर उसके सर पर हाथ फेर रही थी, ज्यों-ज्योंअंधकार घेर रहा था वो भी अतीत के अंधकार में गुमनाम होती चली गयी।”उसने एक बार फिर, मौसम का जायजा लेने के लिए हल्का सा खिड़की खोला ही था कितेज हवा के झोको के साथ आया बारिश का पानी उसे भिगोंते हुए पूरे कमरे मे फैलगया। झटके से खिड़की बन्द करते हुए सोच में पड़ गई कि:-“आज शायद ही स्कुल जाना हो इतनी बारिश में” और फिर आज से हाफ ईयरली इक्जामशुरु होने वाला है।

अरे! बिटिया आओ…..आओ,जल्दी अन्दर आओ.तुम तो पूरी भींग चुकी हो, छतरी काहेनही ले लेती हो।चाची, लिए थे देखिए ना ऊ भी टुट गयी है। टुटी हुई छतरी दिखाकर कहा बिट्टु ने।(गुड्डन और बिट्टु पिछले दो साल से सहेली थी, आठवीं में दोस्ती हुई थी और दशमीमे पक्की सहेली बन चुकी थी।आज दोनो की छह माही परीक्षा थी।जुलाई का पहलासप्ताह चल रहा था, और ठीक फरवरी माह अगले साल यानि वर्ष 1998 मे होने वालाथा।इसलिए दोनो इस बार छह माही परीक्षा को भी महत्वपूर्ण लेकर ही चल रही थी।चूँकी, दोनो ही मध्यम दर्जे की छात्रा थी दोनो के ही अन्दर वाजीव डर था,इसीकारण दोनो मे से कोई भी तैयारी का साधारण अवसर हाथ से जाने नही देना चाहतीथी।)बिट्टु की आवाज सुनकर, उसने अपने बक्सा से कुर्ती-सलवार निकाली और बिट्टु कीतरफ कपड़़े फेकते हुए कहा-चल अब बाते बन्द कर जल्दी से चेन्ज करके बाहर आ, पहले ही बहुत देर हो चुकी है।इसकी क्या जरूरत थी गुड्डन, बिट्टु कपड़े लपकते हुए बोली।पूरी भींग चूकी है बिटिया पहन ले। गुड्डन की माँ ने कहा।पर चाची…………….पर-वर कुछ नही जल्दी करो, बिट्टु को उसने बनावटी गुस्से से कहा।

जानते हो चंदू अब मन कर रहा है कि अन्नतपुर में एगो बिजनेस कर ले कोई अच्छीजगह मिले तो।काहे नहीं मिलेगा,खोजने से त भगवानो मिल जाता है, डीलर साहब आपको जमीन चाहिएना त निश्चित मिलेगा।इस इलाके मे सब तो आपहि का है बस आप आदेश करिए।चापलूसीकरते हुए चंदू ने बुच्चन बाबू से कहा, तो बुच्चन बाबू का कलेजा गर्व से फुलगया, और उसके होठों पर अहंकार का मुस्कान फैल गया।

गुड्डनमा माई! गुड्डनमा माई! सुनती हो की नही ,कन्हाई जी ने हाँफते हुए अपनीजनानी को आवाज दिए जा रहा था।क्या हुआ बाबूजी………..?????????हांफता आवाज हुआ आवाज सुनकर गुड्डन दौड़ते हुए कन्हाई जी के पास पहूँची।बिटिया गर्म पानी लाव और बाकस पर दवाई ऊहो।ले पुजा ई गरम तेल बाबूजी के पैर और छाती में रगड़ना, हम दवाई लेके आ रहै है।के हुआ रे ! पूजा तुम्हरे बाबूजी को………????????ए गुड्डनमा-बाप ! ए गुड्डनमा -बाप अपन आँखन खोलॉ। और इतना कहकर उसका चेहरापकड़े रोना शुरू कर दिया ।माई ! काहे रो रही हो दवाई दे दिए है आराम करने दो जल्दी ही ठीक हो जाएगें। औरकुन्ती देवी के गोदी से छुटकी को लेकर खिलाने के लिए जाती है।माई! माई! मामा जी आए है। गोबिन्द, दौडकर खुश होकर माँ की गर्दन को पीछे सेपकड़कर लाड जताकर बिस्कुट दिखाया और खाने लगा।कैसी हो दीदी……! पैर छुककर प्रणाम करते हुए रामदीन ने पूछा। खुश रहो! मैं तो ठीक हूं, तुम बताओ…….तुम कैसे हो?बहुरिया और बच्चे तोठीक है ना ?हाँ,दीदी सब ठीक है।चौधरी जी नही दिख रहे………??क्या कहे बऊआ, अब तो जादा ही तबियत खराब रहने लगी है।बिटिया बड़ी हो रहीहै,एगो तो नहीं है चार-चार गो दीहिन दीनानाथ ने।हम त कहते-कहते थक गये है किथोड़ी-सी जमीन खरीदकर देह में लगा लो लेकिन हमरी सुनता कौन है यहाँ।अच्छा तुम ही कहो बबूआ कि बेर-बेगरता लेल ना जमीन-जथा रहता है।हूं…….ई त ठीके कहती हो।एगो पेड़ा के दोकान से छह-छह गो बच्चवा का पालन -पोषण कैसे होता हमरा हृदय हीजानता है।गुड्डनमा दशमी का परीक्षा दे रही है।जमाना बदल रहा है,कम-से-कम दशमी नहीकराऐगें तो बिटिया सब का तो बियाहों कौन करेगा।कहते-कहते कुन्ती देवी का गला रून्ध गया। ना जाने कब से आँखों में समन्दर छुपारखा था सो आज आँखों से बह निकला।दीदी, तुम चिन्ता मत करो दीनानाथ सब पार लगाएगें।

बुधना……रे बुधना!जी मालिक……सुनो, चन्दु को बुला लाओ।जी मालिक अबहिये जाते है।एक सप्ताह से ऊपर हो गया,की मजाल जे एकौ बार भेटों देता। बुधन के चले जाने केबाद बुच्चन बाबू बड़बड़ाने लगे।मालिक! मालिक! थोड़ी देर बाद हांफते हुए आया।के हुआ ???? इतना हांफ काहे रहे हो…..मालिक, चन्दु मालिक का तबियत बहुते खराब है, इसलिए एतना दिन से नही आ रहे है।

‘आईये भाईजी बैठिये’ अपने बिछावन पर से उठते हुए चंदु ने कहा।भाईजी, हम पता लगाए थे यहां के जमीन का। त जानकारी मिला जे ई जमीन कन्हाई काहै।एक बात ऊ ई जमीन बेचवो नही करेगा। ऊको रहने का ईहे जगह मिला है।बुच्चन बाबू -ऊ बात सब छोड़ो पहिले अपना तबियत ठीक करो।चंदु- तबियत त ठीक हो गया है बस थोड़ा कमजोरी है। हम त अपने दु-चार दिन मेंआने वाले थे।बुच्चन बाबू- ठीक है त चलते है एक दिन बात भी कर लेगें और उनके दोकान के पेड़ा का स्वाद भी चख लेगें।कुछ दिन बाद-बेटा,दोकान पर तुमहि हो। तुम्हरे बाबूजी कहाँ है……???? चंदू ने पूछा।बाबूजी तो नही कुछ देर बाद आवेगें।कितना का पेड़ा चाहिए। बहुत ही भोलेपन सेजबाब दिया था गुड्डन ने।अभी-अभी कुछ पहले ही पन्द्रह पुरा करके सोलहवां साल मेप्रवेश किया था उसने। आज रविवार का दिन था,इसलिए बाल धोने के कमर तक लम्बाकाला बाल खुला छोड़ा था उसने।गोल चेहरे पर भोलापन लिए,बड़ी-बड़ी आँखे ऊपर सेमुड़ी हुई बड़ी-बड़ी आँखों की पुतली,सुर्ख लाल गुलाब की पंखुरियो जैसी कामुकहोंठ और उसका दुधिया रंग,छरहरा गठिला बदन कुल मिलाकर बला की खुबसूरत अप्सरा लगरही थी। पच्चीस साल के बेटे होने के बाबजूद बुच्चन बाबू के पूरे शरीर मे सिरहनदौड़ गया था।अपलक उसे निहारते रहे।वैसे भी, बुच्चन बाबू के जिन्दगी में औरत कामतलब ही वासना था।किसी औरत से मिलता तो उसकी नजर नारी देह को निहारता तो फिरअभी-अभी जवानी की दहलीज पर पैर रखने वाली गुड्डन “जो कि सच में किसी गुड़ियाजैसी सुन्दर थी” कैसे उसके नजर से बची रह सकती थी।भाईजी! भाईजी! चंदु जब बुच्चन बाबू के आँखों के सामने हाथ लहराया तो उन्हेकिसी और दुनिया में पाया।भाईजी….भाईजी! उनके शरीर को झकझोड़ा।आं….आ…क..के हुआ???? चंदुकुछ नहीं हुआ भाईजी एक पाव पेड़ा ले लिया है। अब दोकान पर जिसके लिए आए थे ऊतो था नही,अच्छा नही ना लगता है दोकान पर से खाली हाथ लौटना।हाथ मे लिए पेड़ाका पलोथीन दिखाते हुए चंदु बोला।ठीक किए, अब चलो। कन्हाई से दूसरे दिन मिलना होगा। बुच्चन बाबू ने गुड्डन कीतरफ देखते हुए कहा।एगो बात पूछे चंदु…….?जी ! पूछिए। बुच्चन बाबू के खोये-खोये से पूछने पर चंदु चिन्तित स्वर मे हामीभरा।ऊ….दोकान पर बच्चिया कौन थी, कन्हाई की बिटिया क्या????बुच्चन बाबू ने पूछा।हाँ त कन्हाई के दुकान पर उसकी बिटिया नही रहेगी तो और किसे रहना चाहिए। चंदुने अपनी हंसी दबाते हुए जबाब दिया।”वो लड़की सिर्फ हमरी घर की शोभा बनने के काबिल है,पहले वो लड़की मेरे आयेगीअब ,फिर जमीन तो हमरी ही है।”मन ही मन सोचकर बुच्चन बाबू मुस्कुराने लगे।त भाईजी, हम चलते है अब। कुर्सी पर से उठते हुए चंदु ने कहा।कहाँ चले….?हाथ पकड़कर बैठाते हुए बुच्चन बाबू ने कहा।हम सोच रहे थे कि कन्हाई की लड़की से अपने बड़का लड़का सुनील की शादी का बातचलाओ तुम।के…..के कहा भाईजी! अचरज मे पड़ गया ये बात सुनकर चन्दु।वही जो तुमने सुना……..।पर, भाईजी! जमीन से शादी की बात पर कैसे चले गये।क्योंकि हमरे बचवा की शादी की उमर हो गई है और वैसी ही लड़की सुनीलवा के लिएहमका चाहिए।और बात रही जमीन की त आब ओकर बात बाद में सोचेंगे।अपनी वासना भरीनजरों को झुकाते हुए बुच्चन बाबू ने।ई बात एक नम्बर सोचे है आप ।बेचारे कन्हाई का तो बहुत बड़ा भला होजाएगा,चार-चार गो बच्चिया है और भगवान आपका भी भला करेगा।बड़े आदर से चन्दुबोला।पर भाईजी ! ओके पास एतना औकाद कहाँ है? जो आपको तिलक दहेज दे सके।ओके पास एतनाभी औकाद नही की वर-बरयाति का ढ़ंग से खातिरदारी कर सके।दया भाव से चंदु ने कहा।ऊ सब हम कर लेंगे बस तुम कन्हाई को राजी करो।जल्दी ही के बात हुआ हमको कहो।ठीक है ,हम आजहि उससे बात कर लेते है।जाने के लिए कुर्सी से उठते हुए चंदु नेकहा।

गुड्डनमा माई! गुड्डनमा माई!…..कहां गई रे। खुशी से पागल होकर लगातार कन्हाईअपनी जनानी को आवाज दिए जा रहा था।के हुआ….गुड्डनमा बापू काहे चिल्ला रहे हो। आते ही बोल पड़ी के बात है बहुतखुश नजर आ रहे है।गुड्डनमा माई तुम भी सुनोगी ना तो खुशी से पगला जाओगी।अरे! कहेंगे तब ना हम भी खुशी से पगलाएगें। उसी का नकल करते हुए कुन्ती देवीमुस्कुराते हुए बोल पड़ी।अपनी गुड्डन का रिश्ता बहुत बड़े घर से आया है। बगल के हरषा गांव के बुच्चन बाबू के लड़का सुनील बाबू के लिए।अच्छा ! पर कैसे ???अचरज से कन्हाई को ऐसे देख रही थी मानो विश्वास नही हो रहा हो।अरे बतहिया! उस दिन अपनी बिटिया कह रही थी ना कि दु गो लोग हमका खोज रहे थे।ऊकोई और नही चंदु बाबू और बुच्चन बाबू थे। हमरी बिटिया है ही इतनी सुन्दर परीजैसन,पसंद कर लीहिन पहिले नजर में।पर! हमरे पास त वर-बरियाति के खर्चा के लिए भी पैसा नही है,और दान दहेज के लिएकहाँ से पैसा जुटाऐंगे। एतना बड़ा परिवार है,शादि -बियाह बराबरी वालो मे हीठीक होता है, ऊ कहाँ और हम कहाँ। असमंजस में पड़ी कुन्ती देवी ने कहा।हम पगलैल नही ना है, जो तुम कह रही हो ऊ बात हम कर चुके है।और बात रहीबड़न-छोटन का तो शादी-बियाह ने बिटिया का भाग काज करता है, जोड़ी त भगवानलगावत है।ठीके कहते हो……!कुन्ती खुद को समझाते हुए हामी भर दी।

वक्त पंख लगाकर उड़ गया छह महीने कैसे बीता ना ही कुन्ती देवी को और ना हीकन्हैया को एहसास हुआ।शादी का दिन आ भी गया , गुड्डन तो आसमान से उतरी अप्सरालग रही थी सुर्ख लाल शादी के जोड़े में।गुड्डन के मन में शादी को लेकर पिछले एक महीने से सौ सवाल थे। उसकी शादी कीखबर उसे दशमी की परीक्षा के बाद ही दी गई थी क्योंकि कुन्ती देवी नही चाहतीथी कि गुड्डन की पढ़ाई में कोई बाधा आये।परीक्षा के ठीक बाद मां ने खबर केसाथ-साथ उसे बहुत बात समझाया भी था। पर वो मां और प्रश्न का जबाब कैसे पाती।शांत और शर्मिला स्वभाव के कारण “उसको समझने वाली दिल बहुत करीब ” बिट्टु सेभी दिल की बात खुलकर नहीं कर पाती फिर मां से ये सब बात करना उसे अजीब लग रहाथा।उसे बहुत घबराहट हो रहा था जैसे सभी लड़की को होता है।और फिर, सुनील के साथ गुड्डन की शादी भी हो गई। शादी में बुच्चन बाबू नेबढ़-चढ़कर कर दोनो तरफ का खर्चा किये थे। ।विदाई के दिन तो लग रहा था जैसेगुड्डन अब कभी नही मिलेगी। जैसे-तैसे गुड्डन को गाड़ी मे बिठाया गया।फिर गुडड्न ससुराल आ गई, दो झोपड़ीनुमा कमरो से एक भवन में आ गई थी।लोग नई-नवेली दुल्हन को देखने आये,गांव की औरते बड़ाई करती नही थकते।बड़ाई सुनकर बुच्चन बाबू और उनकी पत्नी रेखा का कलेजा गर्व से फुल गया था।एक और आँखे थी जो बेमन से खुश हो रही थी,वो थी रेखा देवी की बड़ी बहन रामदुलारी का।उसका हृदय जल रहा था क्योंकि वह बुच्चन बाबू के नजर के तीर को पढ़ चुकी थी। वहजान रही थी कि बुच्चन बाबू की वासनापूर्ण नजर देख रही थी उस सोलहवर्ष लड़की को।दरअसल,25वर्ष पहले रेखा देवी की शादी बुच्चन बाबू से हुई तब रेखा देवी सेज्यादा आकर्षक रामदुलारी देवी थी।हालांकि, रामदुलारी देवी, रेखा देवी से बड़ीथी लेकिन गोरा रंग और छरहरा बदन के कारण उससे छोटी लगती देखने में। और इस बातका घमण्ड रामदुलारी को बहुत था।रामदुलारी का पति कलकत्ता में रहता था,औरबुच्चन बाबू की नजरे उस पर गड़ी रहती। दोनो में नाजायज संबंध स्थापित हो चुकाथा।ऐसा नहीं था कि रेखा देवी को कुछ भी मालूम नहीं था,उसे जब पहली बार पता चलातो उसने विरोध भी किया पर उसे मार लगता था साथ में छोड़ देने की धमकी भी।बादमें,उसने कुछ भी कहना छोड़ दिया।वो नजायज संबंध आज भी कायम था लेकिन गुड्डन केतरफ उठती हवस भरी नजरें उसे अपने साम्राज्य का अंत लग रहा था।

विदाई के दिन के चौथे दिन चुल्हा – छुआई की रस्म भी हो गया।वह बहुत थक चुकी थीइसलिए बेड पर आते ही नींद के आगोश में चली गई।

बहुरिया ! बहुरिया! कब तक सोयी रहेगी।रामदुलारी के चिल्लाने पर गुड्डन जैसेहड़बड़ा कर उठ कर बैठी।जी! मौसीजी कोई काम है,गुड्डन ने हड़ब़ड़ाते हुए पूछा।बहुरिया! बाबूजी आये है तुम्हारे ,चाय बना दो।रात का सब काम समाप्त कर कमरे में जाती है।आज बहुत थक गई थी,और उसे हल्काबुखार आ गया था।परन्तु दु:ख तब हुआ जब सुनील ने एक बार भी उसके तबियत की फिक्रतक नही की और गुड्डन के कहने पर भी उसके साथ संबंध बनाये।आज उसके आंखो मेंआंसू आ गया था।शादी के दिन से उसने पति का मतलब केवल रात के बिस्तर साझाकरनेवाला मर्द समझा था।दु:ख-सुख में साथ देने वाला मित्र या फिर जिसके साथप्यार और सुरक्षा का ऐसा कोई भी भाव उसने महसुस नहीं किया था।देखो जी! बिटिया को ससुराल गये दो महीना से ऊपर हो गया सोच रही हूं विदागरीकरा लूं।दस दिन रह लेगी फिर दे आना।चेहरे पर चिन्ता,प्यार और खुशी का मिलाजूलाभाव लिए कुन्ती देवी ने कन्हाई से कहा था।मालिक ! मालिक ! बहुरिया के बाबूजी आये हुए है।ठीक है! उन्हें बिठाओ और चाय नाश्ता का इंतजाम मालकिन से कहो करने के लिए, हमआते है। नमस्कार!नमस्कार!कन्हाईबाबू। कुटिल मुस्कुराहट के साथ दिया था।जी! नमस्कार! हाथ जोड़कर अभिवादन का जबाब दिया था कन्हाई ने।आपकी बिटिया बहुत भाग्यशाली है,देखिये कहां से आ गई! बुच्चन बाबू ने एहसान भरेशब्दों में कहा।जी! सब ईश्वर की कृपा और आपका प्रेम है बुच्चन बाबू।आपकी इजाजत हो तो कुछ दिन के लिए बिटिया को ले जाए।कन्हाई ने आग्रह भरे भाव सेबोला!जी! जी! क्यों नहीं????गोबिन्द आते ही दीदी! दीदी! करते घर के अन्दर जा चुका था।उसके बाद कन्हैया जीको भी अन्दर ले जाया गया।गुड्डन, बहुत दिन बाद बाबूजी और गोबिन्द से मिली थीसो बरबस ही उसकी आँखे बरस पड़ी।दीदी आई! दीदी आई! उत्साह से चिल्लाते हुए पूजा दौड़ते हुए आंगन आई।कैसी है बचवा???मां ने लाड से पूछा।ठीक हूं मां! कहते ही फफककर रो पड़ी थी। क्या बताती अपने मन की पीड़ा माँ को।कैसे बताती क्या कहकर यहां भेजा गया है।दो-चार ही दिन पहले उसे कहा गया था किये जमीन सुनील के बिजनेस के लिए मांगना है।उसे तो सुनील ने इतना तक कह दिया थाकि यदि यह जमीन उसे नहीं मिलेगी तो उसे वह हमेसा के लिए छोड़ देगा।ए!गुड्डन! तुम्हारे ससुरालवालों के लिए बाबूजी कपड़ा दिए थे वो सब पसंद आया कीनहीं,जितना औकाद था उन्होंने सब के लिए कपड़ा खरीदा था। अफसोस भरे लहजे मे कहाथा कुन्ती देवी ने।ह…..हां माँ सबको बहुत पसंद आया।कंपकपाते हुए होठों से उसने सफेद झुठ बोलाथा।आजकल उसका मन अलसाया हुआ रहता,हमेशा उसे बेवजह उल्टी जैसा मन रहता।10 दिन आगेचल रहा था इस महिने में सारे लक्षण उसके दुसरे खुशखबरी की तरफ इशारा कर रहा था।चिन्ता की बात नहीं है आपकी बेटी माँ बनने वाली है।पूरे परिवार के लिए खुशी कालहर था।बुच्चन बाबू को जैसे ही पता चला मिठाई लेकर आ पहूंचे।वैसे भी कितने दिनहो चुके थे आँखों की सेकाई नहीं हो पाई थी।”अब तो बहु अपने नैहर वालों से मिल ही चुकी है” हम दिन करके भेज देंगे।हमरीबहु को भेज दीजिएगा।पर, बिटिया का पहला बच्चा तो नैहर में ही होता है ना बुच्चन बाबू! आशा भरीनजरों से देखकर कहा था कन्हाई ने।नहीं…नहीं!ई सब पुरान बात है हमरी बहू का देखभाल यहां अच्छे से नहीं होपाएगा।कन्हाई बाबू गुम हो गए दिन हुआ सुनील गुड्डन को आकर ले गया। गुड्डन पता नहीबहुत रोये जा रही थी,अपनी माई से कोई भी दु:ख नहीं कह पाई।पर वो भी क्या कहतीसब इतने खुश थे और वैसे मामूली बात सब थोड़े था जो कहती।कुन्तीदेवी का हृदयमान ही नहीं रहा था कि उसे अभी जाने दे ,लग रहा था मानों आखिरी ही बार उसे देखरही है।तु समझती क्या है? काहे नहीं बोली अपने बाप को।बाल को पकड़कर खींचते हुए सुनीलबोला।देखिए मेरे बाबूजी के पास वही एक जमीन है। मेरे अलावा भी तीन और बिटिया है अबरोते हुए उसने पैर पकड़ लिया था फिर भी सुनील को दया तक ना आई।सारा दिन गुड्डन काम करती,मौसी सास और सास-ननद का ताना सहती और पति का मार।एक दिन चाय लेकर बुच्चन बाबू के कमरे मे जैसे ही पैर रखा आगे का दृश्य देखकरपैरों तले जमीन खिसक गई! उसने रामदुलारी और बुच्चनबाबू को आपतिजनक अवस्था मेंदेखा। उल्टे पैर वह लौट आई डर से कांप रही थी,किसी को नहीं कह पाई कौन उसकाविश्वास करता।इस बात को दो दिन बीत चुके थे पर गुड्डन के दिमाग वो सारे दृश्य ज्यों केत्यों थे।आखिरकार खुद को रोक नहीं पाई,हिम्मत करके उसने रेखा देवी से सारा बातकहा तो इस बार भी हैरान होने की बारी उसकी थी।देख बहुरिया! औरतों का काम घर की और पति की सिर्फ देखभाल करना है,मर्द के पीछेनहीं जाती।तुम भी घर-परिवार पर ध्यान दो बस !कहती हुई रेखा रसोईघर से निकलपड़ी।8वां महिना पूरा हो चुका था वो जो काम करने लायक करके आराम कर रही थी इतने मेंबुच्चन बाबू की इकलौती बेटी नीतू आई और उसे जगाने लगी।वो गहरी नींद में थी नहीं उठ पाई बस उसने गुड्डन को उतने ऊँचे पलंग से ढ़केलदिया।बस उसका बच्चा जन्म लेकर 2घंटे ही जिन्दा रह सका और गुड्डन चमकी बिमारीका शिकार हो गई।और जब घर आई तो उसकी जिन्दगी बद से बदतर हो चुकी थी।दो दिन ही आये हुए थेअस्पताल से कि बुच्चन बाबू के तेवर बदल चुके थे।सुनील तो वैसे भी कमरे में छहमहीने पहले ही आने बन्द कर दिये थे।आज उसका समान सब भी उसके कमरे से निकाला जारहा था।धोखे से एक सर्ट भी छुट गया वह उसने मौसी से ही मंगवाये थे।ए! बहुरिया तुम्हरा भीखमंगा बाप नहीं देगा ना जमीन तो हम तुम्हरा बुटी- बुटीनोंच लेंगें।अचानक,बुच्चन बाबू को अपने कमरे में पाकर सहम गई थी।तुम तो गीदड़ हो ही नोचने के अलावे कर ही के सकते हो।लेकिन हमरे बाबूजी किसीकीमत पर ऊ जमीन तुमको नहींदेंगे।पर! आज उसे जाने इतना ताकत कहां से आ गया था।अरे! हरामजादी हमको ऐसे जबाब देगी,तुम्हरे बाप को डरा धमका दिए है ऊ भीखमंगाकल ही जाएगा कोर्ट मेरे नाम का कागज बनबाने।उसे पीटकर ये बात कहतेहुए कमरे से बाहर निकल गया।नहीं! ऐसा नहीं हो सकता,मेरे लिए बाबूजी सबका जीवन दांव पर नहीं लगा सकते।मुझेबाबूजी को रोकना होगा।कल सुबह ना जाऐंगे हम आज रात ही भाग जाऐंगे।”जा रहे है, आज सब वसुलेंगे” सोचते हुए जैसे ही गुड्डन के कमरे में गये उसेवहां नहीं पाकर आग बबूला होकर सबको जगा दिया।गुड्डन को पकड़ लिया गया बुच्चनबाबू ने उसे खूब पीटा।और अधमरा करके कमरे मेंबन्द कर दिया।के करे !हमरी बिटिया को बचाना है तो ई करना पड़ेगा। ऐसा कहते हुए लाचारी सेनिकल पड़े थे कागज बनवाने।और कुन्ती देवी सर पीटकर रोने लगी।”आज नहीं हो पाया काम,बस इसे आज भर ही सहन करना है जैसे ही काम हो जाएगा,इसकाभी काम तमाम कर ही देंगे”।गुड्डन ने बुच्चन बाबू की बाते सुन ली थी।चांदनी रात के एक बज रहे थे, गुड्डन खिड़की से कमरे के पिछले भाग मेंकुदी।इसके बाद, जैसे ही आंगन में आयी। देखा कि बुच्चन बाबू और सुनील आंगन मेंही मेन गेट पर सोये हुए थे और मेन गेट पर ताला लगा हुआ था।अब उसे कोई रास्तादिखाई नहीं दे रहा था,और आज नहीं निकलती तो कभी नहीं निकलती।उसे किसी तरहभागना ही पड़ेगा,उसने आव ना देखा ताव मेन गेट के बगल वाले दिवाल पर टुल लगाकरचढ़कर कुद गई।उसके जाने के 15मिनट बाद बुच्चन बाबू पानी पीने के लिए उठे कि टुल दिवाल केपास देखकर सब मांजरा समझ में आ गया।रे सुनीलवा! भाग गई साली जान मरवाएगी।और उसके पीछे भागे।”ज्यादा दूर नही गई उसे कहीं देखल नही है।”पकड़ी जाएगी।इधर गुड्डन भागी जा रही थी,उसे थोड़ा-थोड़ा याद था बिट्टु के साथ तीन सालपहले।आज उसे किसी भी चीज का डर नहीं था।सुबह के 5बज रहे थे दवाई की आखिरी डोज देने के लिए उठी ही थी,सामने का मंजरदेखकर कुन्ती देवी का कलेजा दहल गया।उसकी फूल जैसी बिटिया सिर्फ ब्लाउज औरपेटीकोट में,लम्बे-लम्बे बाल खुले हुए धरती पर बेजान पड़ी है।गुड्…डन! आँखें खोलॉ बेटा!उठ ना बेटा! पत्थर का भी दिल तड़प उठता।रे गो….बिन्दा! पानी ला रे,बेटा….उसका चेहरा पकड़-पकड़ कर उठाने की नाकाम कोशिस कर रही थी।पास ही में बैठेकन्हाई जी रो रहे थे।इतने में बुच्चन बाबू आ पहूँचे और जब तक किसी को कुछ समझ में आता, उसने गुड्डनके बाल पकड़कर घसीटते हुए आंगन तक ले आये।गुड्डन अभी ही तो होश में आयी थी,फिरसे बेहोश हो गयी।कन्हाई जी उठे और गुड्डन को छुड़ाने लगे बुच्चन ने उनके कलेजे पर एक घूंसा जड़दिया।बेचारा कन्हाई कलेजा पकड़कर बैठ गया।और बुच्चन बाबू ने दिन देखार गुडड्नके बाल में आग लगा दी,लाईटर से।कुन्ती देवी बुच्चन बाबू का पैर पकड़ी अपनी बेटी की जान की भीख मांग रहीथी।पुजा पानी डालकर बाल की आग बुझाई।भीड़ जमा हो गई अब तक किसी ने हिम्मत नही की इस अन्याय को रोक सके।चंदू बाबू के समझाने पर बुच्चन बाबू वहां से निकला। दोनो बाप-बेटी को हॉस्पिटलमें एडमिट कराया गया।गुड्डन कोमा में जा चुकी थी,कन्हाई ठीक हुआ और अपनीबिटिया के होश का इंतजार करते-करते, पुजा का शादी की।दो कुवांरी बेटी और दोअबोध बेटा ,पत्नी को बेसहारा करके इस दुनिया इस घटना के पांच साल बाद छोड़करचले गये।और कन्हाई के जाने के बाद इन सात सालों में एक बेटी की शादीकी,गोविन्द और गोपाल को पढ़ाया-लिखाया।गलत संगत में पड़कर गोपाल गलत रास्तापकड़कर लिया कुन्ती देवी ने डॉटा उसने भी जहर खाकर जान दे दी।कितना कुछ झेलाकुन्ती देवी ने इतनें दिनों में।”माई!माई……..!बिटिया……..!कब कुन्ती देवी की आँख लग गई थी अतीत के अंधेरो मेंभटकते-भटकते उन्हे खुद को ही पता नही चला।माई! बाबूजी कहां है????गोबिन्द,पूजा,गोपाल,और छुटकी को बुला दो नामाई………….!अटकती आवाज में कहा गुड्डन ने।हां बिटिया सबको बुला देते है !तुम ठीक हो जाओ फिर घर चलकर बाते….!!मा…ई ह..मको बाबूजी आ..आगो..पाल बुला रहे है।ह…मको जा..ना है……….!!!!!!!

न…नहीं मा…ई ! बोलने दो ना!तुमने कहा था ना माई…..!ह…..ह..मरी शादी के ए…एक दिन बाद कि सिन्दुर,चुड़ी आ..आबिन्…दी आधा सु……हाग होबत है।पूरा सोहाग पति का प्रेमहि हॉ।न…ई बोल ना बेटा……!म…ा…ई! उ..न..से हम बहुते प्रेम किये।पुरी सोहा..गिन बनने के लिए।म..म..गर !मा….ई ! ह…मममममम् रहहह ग….ये अ…आ.धी सोहा..गिन!झुल गई कुन्ती देवी के गोदी में आधी सोहाग

गजल

लवों पे मुस्कान सजी है,
तो फिर ये आंखें,
इतनी उदास क्यों है????

अपनो की भीड़ में,
किसे दिल ढ़ूढ़ता है….
आखिर ये दिल बेकरार क्यों है???

हर कोई चाहता है
वफा-ए-मोहब्बत,
तो बेवफाई का बड़ा बाजार क्यों है???

जी रही हूं जिन्दगी मै,
फिर ये मेरा दिल,
मौत का तलबगार क्यों है??????

……श्वेता चौधरी

आंसुओ के थपेड़े में

सोने वाली मुस्कुराहट,

कभी मिटती नहीं।

कितनी भी पीस जाए,

पत्थर पर हिना,

वो अपनी महकती रंग से,

जीवन सजाना भुलती नही ।।

फूल चाहे मुरझा जाए,

वक्त की थपेड़े में।

पर फूल मुरझाकर भी,

महकना छोड़ती नहीं।।

सोना तपकर भी अकसर,

बन जाती है कुंदन।

ईश्वर की सच्ची रचना की हस्ती,

दुनिया के संघर्षों से मिटती नहीं।।

श्वेता चौधरी

रोकु ई संहार

रोकु आब ई संहार यौ भैया
रोकु ई संहार,
अई रक्षा बन्धन में
अहां क बहिन करै पुकार यौ भैया
रोकु ई संहार।

हमहूँ छी आंही के सहोदरा,

आंही के रक्षा के वचन पर।
चढ़ई छी वेदीक बलि पर यौ भैया
रोकु ई संहार ।।

कथि के सम्मान ताकै छी,
और कथि के अपमान यौ भैया,
किछु नै बुझत अहां क गौरव,
ई दहेजक दानव यौ भैया!
रोकु ई संहार।।

बाबा हमर दान केलखिन,
हमरा खुशी लेल जीवन गंवैलखिन
मिलल हुनका हमर लाशक उपहार यौ भैया
रोकु ई संहार।।

जे नई रोकब संहारक घटना,
टुटत हमर समाज क सपना।
बेटी विहीन भ जेत ई समाज यौ भैया,
रोकु ई संहार।।

……श्वेता चौधरी

हमर सबाल एक टा

हमर सबाल एक टा

हम छी किनकर बेटी,
छी किनकर हम बहिन यौ।
और छी किनकर घरक पुतोहु,
पूछै छी हम एकटा सबाल यौ।।

हम छी मात्र एकटा बस्तु,
आ कि दहेजक कोरा चेक यौ।
कहै छी हमरा घरक लक्ष्मी,
फेर मारलौ किया गला दबाय यौ।।

भरलौ मांग हमर लाल सैनूर सँ,
बनैलौ हमरा घरक नूर यौ।
केलौ किया हमर परतर दहेज सँ,
और बनेलौ हमर जिनगी बेनूर यौ।।

बस ईहे टा अछि हमर,
मान-सम्मान अयि समाज में।
चच्चा -भैया, बाबा-बऊआ,
कहवै कनि ई बात बिचारि यौ।।

श्वेता चौधरी

अटल गूंज है कभी टलती नहीं

आत्मा अमर है,
आत्मा कभी मरती नहीं।
निशां बांकी रहते वजूद के,
वजूद तो कभी मिटती नहीं।।

जलते जो है मशाल,
फरिश्ते के हाथों।।
वो चिराग-ए-रोशन,
कभी बुझती नहीं।।

महकाते है जो चमन,
पूरे फिजां को अपने महक से।
मुरझा जाए वो चमन तो क्या,
महकना फिर भी कभी वो छोड़ती नहीं।।

मिटा सकेगी ना गुंज कभी,
मौत अपनी कहकशां से।
गुंजती रहेगी गीत कायनात मे,
अटल गूंज है कभी टलती नहीं।।

श्वेता चौधरी